Friday, 3 April 2015

जैन धर्म

मला ज्याप्रमाणे जैन धर्माची माहिती आहे ईथे अवतारमहिमेला सक्त विरोध केला आहे
तुम्ही जसे कर्म कराल तसेच फळ तुम्हाला मिळेल हे हा धर्म सांगतो

जैनाचे 24वे तीर्थंकर वर्धमान महावीर हे कोणत्याही परमेश्वराचे अवतार नव्हते तर त्यांनी कर्म चांगले केले म्हणुन ते वर्धमानचे भगवान महावीर झाले हे जैन धर्म  मानतो
जसे गौतम बुध्दाला वैदिकांनी विष्णुच्या अवतारात टाकण्याचा प्रयत्न केला तसाच प्रयत्न महावीरांबाबतही झाला होता पण जैनांच्या विरोधामुळे व आधीच्या 23तीर्थंकराचे काय करायचे या अडचणीमुळे वैदीक ब्राम्हणाचा तो डाव फसला
क्रुष्ण राम यांचे सगळ्यात जुने पुरावे जैन धर्मातील ग्रंथातही अरधमागधी व आंग्ल भाषेत मिळतात पण ते विष्णु वा कुणाचा अवतार म्हणुन नाही तर  ते एक माणुस म्हणुन जन्माला आले होते व आपल्या कर्मानी ते मोठे झाले असे जैन धर्मात लिहलेले आहे

"माणसाचा देव अथवा अवतार ज्या वेळेला केला जातो त्या वेळेला त्याच्या अभ्यासाची गरज संपते, अनुकरणाचीही गरज संपते. हा श्रद्धेने निर्माण होणारा फार मोठा पायगुंता आहे. तो टाळण्याचा आपण यथाशक्ती प्रयत्न केला पाहिजे."

कारण अश्यामुळे काय होते अरे ते क्रुष्ण महावीर बुध्द देव होते म्हणून त्यांना ते शक्य होत आपण सामान्य माणुस आणि माणसाचा देव एकदा केला कि त्याची चिकित्साच आपण करत नाही
संकेत मुनोत

Saturday, 28 March 2015

राम आणि रावण , काळा कि पांढरा ?

राम आणि रावण , काळा कि पांढरा ?
आपल्याला विचारांपेक्षा प्रतीकांच्या समारंभात जास्त रस असतो हेच दोन्ही वादात दिसून आलय.
रामाच चित्र पूर्ण पांढर नाही आणि रावणाच चित्र पण पूर्ण काळ नाहीये. हा आपल्या मनाचा खेळ आणि भाबडा अट्टाहास आहे म्हणून आपण बळेच राम सगळा सफेदधोट करायला जातो आणि रावण काळा करायला जातो.
प्रसंगी त्रास सोसून आज्ञापालन करणारा , राज्य सोडून वनवास स्वीकारणारा राम , राम म्हणून जगताना मनुष्यस्वभावानुसार चुकतो आणि चुकांची शिक्षा भोगतो. राम सत्यवचनी म्हणवतो पण वाली-सुग्रीव लढाईत कपट करतो. शूर्पणखा प्रकरण , सीतेची अग्निपरीक्षा आणि शेवटी गर्भवती सीता पुन्हा त्यागण ह्या प्रत्येक वेळी राम चुकतो आणि त्याच माणूसपण सिध्द करतो.
राम चुकतो म्हणून त्याच शौर्य ,त्याचे सदगुण कमी होत नाहीत.
रावण , चौदा विद्या चौसष्ट कलांचा अधिपती. प्रजाहितदक्ष राजा जो आपल्या कर्तुत्वाने लंकेला सोन्याची करतो तो बहिणीच्या अपमानाने आणि तिच्या राज्यात आलेल्या अतिक्रमणाने पेटून उठतो. पण हा भावाचा क्रोध राजाच्या विवेकावर मात करतो आणि भाऊ रावण सीतेच हरण करतो.
पण सीतेच हरण करूनही राजा रावण अशोकवनात तिला सुरक्षित ठेवतो आणि तिची अब्रू राखतो.
युद्धात हरल्यावर राम लक्ष्मणाला राज्यकारभाराची आणि युद्धशास्त्राची गुपित सांगतो. अनावर झालेल्या क्रोधाची राजा रावण किंमत आपल्या प्राणाने मोजतो.
ना राम पूर्ण पांढरा ना रावण पूर्ण काळा.
आपण राम रावण एकमेकासमोर उभे करतो. त्यांना शेजारी उभे करा आणि मग पहा.
रामाच्या आणि रावणाच्या चुकाच ज्याला आठवतात त्याचा रामही काळा आणि रावणही काळा.
रामाचे गुण आणि रावणाचे गुण ज्याला आठवतात त्याचा रामही पांढरा आणि रावणही पांढरा.
तोच राम तोच रावण. बदलते ती आपली नजर.
दिसला दगड , फास शेंदूर आणि आपटा डोक.
रावणाच मोठेपण रामाला पण मोठ करून गेल.
देव म्हणून पुजायला गेलात तर तर्काच्या कसोटीवर असंख्य न सुटणारे प्रश्न पडतील. त्याला माणूस म्हणून पहाल तर प्रत्येक माणसाला आपल्या आतच रामही दिसेल , रावणही दिसेल आणि हनुमानपण दिसेल.
त्याला देवत्व देण्यापेक्षा माणूस म्हणून पाहिलं तर राम समजेल.
आपल दुखण त्याला माणूस म्हणून समजून न घेता फक्त प्रतिक म्हणून देव्हाऱ्यात शेंदूर फासून ठेवण आहे.
त्याला माणसात आणा.सगळ सोप होईल.

आनंद शितोळे ©

Sunday, 8 March 2015

गांधी हत्या सच

गांधी हत्या सच

इस लेख को पढकर आपके आंखे खुल जायेगी कुछ धर्म के ठेकेदार अपना उल्लू सीधा करने के लिये किस तरह इतिहास को तोड़ मरोड़कर पेश कर रहे है वो भी देखे , महात्मा गांधी की हत्या की सच्चाई आपके सामने ला रहे—
पहले झुठ बता दु
* पहला मिथ यह है कि गांधीजी मुसलमानों तथा पाकिस्तान के पक्षपाती थे।
*दूसरा ‘मिथ’ यह है कि गांधीजी की हत्या 55 करोड रुपयों के कारण की गयी
* तीसरा ‘मिथ’ यह है गांधी की हत्या करनेवाले बहादुर, देशभक्त और प्रामाणिक व्यक्ति थे।
*चौथा मिथ यह कि गांधीजीने भगतसिंहको फाँसीसे बचनेकेलिए कोई प्रयास नही किए
परन्तु सत्य यह है कि ये तीनों ‘मिथ’ बिलकुल गलत हैं। आइये इन तीनो कारणो की सच्चाई बताते है
नाथूराम और उसके साथियों ने जान-बूझकर, षड्यंत्रपूर्वक ठण्डे कलेजे से गांधीजी की हत्या की थी।
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‘पन्नास कोटीचे बली’ नाथूराम का अदालत में दिया हुआ बचावनामा है, और ‘गांधीहत्या आणि मी’ गोपाल गोडसे की, आजीवन कैद की सजा होने के बाद लिखी गयी पुस्तक है। ये दोनों पुस्तकें पढने के बाद मुझे महसूस हुआ कि नाथूराम गोडसे धर्मजनूनी जरूर था, मगर पागल नहीं था। हम जिसको सिरफिरा कहते हैं, ऐसा तो वह हरगिज नहीं था।
गोडसे-बन्धुओं की पुस्तकों को पढने के बाद हत्या का सही कारण जानने के लिए मैंने अन्य अनेक ग्रन्थों का अध्ययन किया। प्यारेलाल लिखित ‘द लास्ट फेज’, गांधी हत्या का केस जिनकी अदालत में चला था उन न्यायमूर्ति खोसला की लिखी पुस्तक, ग्वालियर के बचाव पक्ष के वकील एडवोकेट इनामदार के संस्मरण, और गोडसे- बन्धुओं का प्रतिवाद करनेवाली कई दूसरी पुस्तकें पढने के बाद मुझे यकीन हो गया कि गांधीजी की हत्या 55 करोड रुपये के प्रकरण से उत्तेजित होकर नहीं की गयी थी। भारत का विभाजन और 55 करोड रुपये का प्रश्न खडा हुआ, उसके बहुत पहले ही इस टोली ने गांधीजी की हत्या करने का निश्चय कर लिया था और कई बार गांधीजी की हत्या करने के प्रयास भी किये
गये थे।
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पाकिस्तान को 55 करोड़ देने के प्रश्न पर की हत्या ?? ये बात पूरी तरह झूठ है
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55 करोड रुपये का प्रश्न तो 12 जनवरी, 1948 को यानी गांधीजी की हत्या के 18 दिन पहले प्रस्तुत हुआ था। इससे पहले, चार बार गांधीजी की- हत्या के प्रयास हिन्दुत्ववादियों ने क्यों किये थे, इसका उत्तर उनको देना चाहिए।
नाथूराम गोडसे उस समय पूना से ‘अग्रणी' नाम की मराठी पत्रिका निकालता था। गांधीजी की 125 वर्ष जीने की इच्छा जाहिर होने के बाद ‘अग्रणी’ के एक अंक में नाथूराम ने लिखा- ‘पर जीने कौन देगा ?’ यानी कि 125 वर्ष आपको जीने ही कौन देगा ? गांधीजी की हत्या से डेढ वर्ष पहले नाथूराम का लिखा यह वाक्य है। यह कथन साबित करता है कि वे गांधीजी की हत्या के लिए बहुत पहले से प्रयासरत थे। ‘अग्रणी’ का यह अंक शोधकर्ताओं के लिए उपलब्ध है।
फिर 55 करोड़ का सवाल कहा से आया ?
प्रथम बार हत्या का प्रयास :
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गांधी-हत्या के प्रयास 1934 से ही !गांधीजी भारत आये उसके बाद उनकी हत्या का पहला प्रयास 25 जून, 1934 को किया गया। पूना में गांधीजी एक सभा को सम्बोधित करने के लिए जा रहे थे, तब उनकी मोटर पर बम फेंका गया था। गांधीजी पीछे वाली मोटर में थे, इसलिए बच गये। हत्या का यह प्रयास हिन्दुत्ववादियों के एक गुट ने किया था। बम फेंकने वाले के जूते में गांधीजी तथा नेहरू के चित्र पाये गये थे, ऐसा पुलिसगरिपोर्ट में दर्ज है। 1934 में तो पाकिस्तान नाम की कोई चीज क्षितिज पर थी नहीं, 55 करोड रुपयों का सवाल ही कहा! से पैदा होता ?
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गांधीजी की हत्या का दूसरा प्रयास 1944 में पंचगनी में किया गया।
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जुलाई 1944 में गांधीजी बीमारी के बाद आराम करने के लिए पंचगनी गये थे। तब पूना से 20 युवकों का एक गुट बस लेकर पंचगनी पहुंचा। दिनभर वे गांधी-विरोधी नारे लगाते रहे। इस गुट का नेतृत्व नथुराम गोडसे कर रहा था
गांधी-हत्या के प्रयास 1934 से ही !
गांधीजी भारत आये उसके बाद उनकी हत्या का पहला प्रयास 25 जून, 1934 को किया गया। पूना में गांधीजी एक सभा को सम्बोधित करने के लिए जा रहे थे, तब उनकी मोटर पर बम फेंका गया था। गांधीजी पीछे वाली मोटर में थे, इसलिए बच गये। हत्या का यह प्रयास हिन्दुत्ववादियों के एक गुट ने किया था। बम फेंकने वाले के जूते में गांधीजी तथा नेहरू के चित्र पाये गये थे, ऐसा पुलिसगरिपोर्ट में दर्ज है। 1934 में तो पाकिस्तान नाम की कोई चीज क्षितिज पर थी नहीं, 55 करोड रुपयों का सवाल ही कहा! से पैदा होता ?
गांधीजी की हत्या का दूसरा प्रयास 1944 में पंचगनी में किया गया। जुलाई 1944 में गांधीजी बीमारी के बाद आराम करने के लिए पंचगनी गये थे। तब पूना से 20 युवकों का एक गुट बस लेकर पंचगनी पहुंचा। दिनभर वे गांधी-विरोधी नारे लगाते रहे। इस गुट के नेता नाथूराम गोडसे को गांधीजी ने बात करने के लिए बुलाया। मगर नाथूराम ने गांधीजी से मिलने के लिए इन्कार कर दिया। शाम को प्रार्थना सभा में नाथूराम हाथ में छुरा लेकर गांधीजी की तरफ लपका। पूना के सूरती-लॉज के मालिक मणिशंकर पुरोहित और भीलारे गुरुजी नाम के युवक ने नाथूराम को पकड लिया। पुलिस-रिकार्ड में नाथूराम का नाम नहीं है, परन्तु मशिशंकर पुरोहित तथा भीलारे गुरुजी ने गांधी-हत्या की जा!च करने वाले कपूर-कमीशन के समक्ष स्पष्ट शब्दों में नाथूराम का नाम इस घटना पर अपना बयान देते समय लिया था। भीलारे गुरुजी अभी जिन्दा हैं। 1944 में तो पाकिस्तान बन जाएगा, इसका खुद मुहम्मद अली जिन्ना को भी भरोसा नहीं था। ऐतिहासिक तथ्य तो यह है कि 1946 तक मुहम्मद अली जिन्ना प्रस्तावित पाकिस्तान का उपयोग सना में अधिक भागीदारी हासिल करने के लिए ही करते रहे थे। जब पाकिस्तान का नामोनिशान भी नहीं था, तब क्यों नाथूराम गोडसे ने गांधीजी की हत्या का प्रयास किया था ?
गांधीजी की हत्या का तीसरा प्रयास भी इसी वर्ष सितम्बर में, वर्धा में, किया गया था। गांधीजी मुहम्मद अली जिन्ना से बातचीत करने के लिए बम्बई जाने वाले थे। गांधीजी बम्बई न जा सके, इसके लिए पूना से एक गुट वर्धा पहु!चा। उसका नेतृत्व नाथूराम कर रहा था। उस गुट के ग.ल. थने के नाम के व्यक्ति के पास से छुरा बरामद हुआ था। यह बात पुलिस-रिपोर्ट में दर्ज है। यह छुरा गांधीजी की मोटर के टायर को पंक्चर करने के लिए लाया गया था, ऐसा बयान थने ने अपने बचाव में दिया था। इस घटना के सम्बन्ध में प्यारेलाल (म.गांधी के सचिव) ने लिखा है : 'आज सुबह मुझे टेलीफोन पर जिला पुलिस-सुपरिन्टेण्डेण्ट से सूचना मिली कि स्वयंसेवक गम्भीर शरारत करना चाहते हैं, इसलिए पुलिस को मजबूर होकर आवश्यक कार्रवाई करनी पडेगी। बापू ने कहा कि मैं उसके बीच अकेला जा।!गा और वर्धा 1रेलवे स्टेशन1 तक पैदल चलू!गा, स्वयंसेवक स्वयं अपना विचार बदल लें और मुझे मोटर में आने को कहें तो दूसरी बात है। बापू के रवाना होने से ठीक पहले पुलिस-सुपरिन्टेण्डेण्ट आये और बोले कि धरना देने वालों को हर तरह से समझाने-बुझाने का जब कोई हल न निकला, तो पूरी चेतावनी देने के बाद मैंने उन्हें गिरफ्तार कर लिया है।
धरना देनेवालों का नेता बहुत ही उनेजित स्वभाववाला, अविवेकी और अस्थिर मन का आदमी मालूम होता था, इससे कुछ चिंता होती थी। गिरफ्तारी के बाद तलाशी में उसके पास एक बडा छुरा निकला। (महात्मा गांधी : पूर्णाहुति : प्रथम खण्ड, पृष्ठ 114)
इस प्रकार प्रदर्शनकारी स्वयंसेवकों की यह योजना विफल हुई। 1944 के सितम्बर में भी पाकिस्तान की बात उतनी दूर थी, जितनी जुलाई में थी।
गांधीजी की हत्या का चौथा प्रयास 29 जून, 1946 को किया गया था। गांधीजी विशेष टेंन से बम्बई से पूना जा रहे थे, उस समय नेरल और कर्जत स्टेशनों के बीच में रेल पटरी पर बडा पत्थर रखा गया था। उस रात को डांइवर की सूझ-बूझ के कारण गांधीजी बच गये। दूसरे दिन, 30 जून की प्रार्थना-सभा में गांधीजी ने पिछले दिन की घटना का उल्लेख करते हुए कहा : ''परमेश्वर की कृपा से मैं सात बार अक्षरशः मृत्यु के मुह से सकुशल वापस आया हू!। मैंने कभी किसी को दुख नहीं पहु!चाया। मेरी किसी के साथ दुश्मनी नहीं है, फिर भी मेरे प्राण लेने का प्रयास इतनी बार क्यों किया गया,  यह बात मेरी समझ में नहीं आती। मेरी जान लेने का कल का प्रयास निष्फल गया।'
नाथूराम गोडसे उस समय पूना से 'अग्रणील् नाम की मराठी पत्रिका निकालता था। गांधीजी की 125 वर्ष जीने की इच्छा जाहिर होने के बाद 'अग्रणी' के एक अंक में नाथूराम ने लिखा- 'पर जीने कौन देगा ?' यानी कि 125 वर्ष आपको जीने ही कौन देगा ? गांधीजी की हत्या से डेढ वर्ष पहले नाथूराम का लिखा यह वाक्य है। यह कथन साबित करता है कि वे गांधीजी की हत्या के लिए बहुत पहले से प्रयासरत थे। 'अग्रणी' का यह अंक शोधकर्ताओं के लिए उपलब्ध है। 1946 के जून में पाकिस्तान बन जाने की शक्यता तो दिखायी देने लगी थी, परन्तु 55 करोड रुपयों का तो उस समय कोई प्रश्न ही नहीं था। इसके बाद 20 जनवरी, 1948 को मदनलाल पाहवा ने गांधीजी पर, प्रार्थनागसभा में, बम फेंका और 30 जनवरी, 1948 के दिन नाथूराम गोडसे ने गांधीजी की हत्या कर दी।
55 करोड रुपयों के बारे में एक और हकीकत भी समझ लेना जरूरी है। देशगविभाजन के बाद भारत सरकार की कुल सम्पनि और नकद रकमों का, जनसंख्या के आधार पर, बटवारा किया गया था। उसके अनुसार पाकिस्तान को कुल 75 करोड रुपये देना तय था। उसमें से 20 करोड रुपये दे दिये गये थे। और, 55 करोड रुपये देना अभी बाकी था। कश्मीर पर हमला करने वाले पाकिस्तान को यदि 55 करोड रुपये दिये गये, तो उसे वह सेना के लिए खर्च करेगा, यह कहकर 55 करोड रुपये भारत सरकार ने रोक लिए थे। लार्ड माउण्ट बेटन का कहना था कि यह रकम पाकिस्तान की है, अतः उन्हें दे दी जानी चाहिए। इस बात की जानकारी गांधीजी को हुई तो उन्होंने 55 करोड रुपये पाकिस्तान को दे देने की माउण्ट बेटन की बात का समर्थन किया। 12 जनवरी को गांधीजी ने प्रार्थना-सभा में अपने उपवास की घोषणा की थी, और उसी दिन 55 करोड रुपये की बात भी उठी थी। लेकिन गांधीजी का उपवास 55 करोड रुपये के लिए नहीं, दिल्ली में शान्ति-स्थापना के लिए था।
जनवरी माह के प्रथम सप्ताह में एक मौलाना ने आकर गांधीजी से कहा था कि पाकिस्तान का विरोध करने वाले हमारे जैसे राष्टंवादी मुसलमान पाकिस्तान जा नहीं सकते, और हिन्दू सम्प्रदायवादी हमें यहा! जीने नहीं देते। हमारे लिए तो यहा! नरक से भी बदतर स्थिति है। आप कलकना में उपवास कर सकते हैं, पर दिल्ली में नहीं करते ? ऐसी शिकायत भी उस मौलाना ने गांधीजी से की थी। गांधीजी मौलाना की बात सुनकर दुखी हो गये थे। दिल्ली में शान्ति-स्थापना के लिए अनेक प्रयास होने के बावजूद शान्ति स्थापित नहीं हुई। अन्त में 13 जनवरी से गांधीजी ने उपवास आरम्भ कर दिया। यह उपवास साम्प्रदायिक शान्ति के लिए था, न कि 55 करोड रुपयों के लिए। 55 करोड रुपयों का सवाल तो संयोगवश उसी समय प्रस्तुत हो गया था। गांधीजी ने अपनी प्रार्थना-सभा में उपवास का हेतु स्पष्ट रूप से घोषित किया था और उसके बाद उनका उपवास समाप्त कराने के लिए हिन्दुत्ववादियों सहित तमाम सम्बन्धित पक्षों ने शान्ति की अपील पर हस्ताक्षर किये थे। इसके बावजूद भी हिन्दुत्ववादी झूठे प्रचार करते जा रहे हैं।
गांधीजी की हत्या करने वाले यह दावा करते हैं कि 55 करोड रुपये की घटना से उनेजित होकर गांधीजी की हत्या का षड्यंत्र रचा गया था। इसका अर्थ तो यह होता है कि यह षड्यंत्र 13 जनवरी के बाद रचा गया था। तो क्या मात्र सात दिनों में, गांधीजी पर बम फेंकने की घटना उस जमाने में सम्भव हो सकती थी ? मात्र 17 दिनों में ही हत्या करनेवाले इकट्ठे हो गये, षड्यंत्र रच लिया, ग्वालियर से पिस्तौल हासिल करके दिल्ली आये और गांधीजी की हत्या कर दी। इतने कम समय में षड्यंत्र रच लिया गया उस पर अमल भी हो गया, यह बात गले से नीचे उतरने लायक नहीं। 13 जनवरी को नाथूराम ने अपनी बीमे की पालिसी नाना आप्टे की पत्नी के नाम करा दी थी। अदालत ने भी अपने फैसले में 1 जनवरी, 1948 को षड्यंत्र-रचने का दिन माना है। कुछ क्षणों के लिए उनकी बात मान भी लें तो 55 करोड रुपयों का सवाल सामने आया उसके पहले से ही, गांधीजी की हत्या करने के प्रयास क्यों किये जाते रहे, यह प्रश्न अनुनरित ही रह जाता है। एक घटना को छोडकर, बाकी सभी प्रयास महाराष्टं में, और पूना के ही हिन्दुत्ववादियों द्वारा क्यों किये गये ? तीन प्रयास तो खुद नाथूराम गोडसे ने किये। इस तरह जाहिर है कि 55 करोड रुपये की बात तो बिलकुल झूठ है।
ऐसे होते हैं देशभक्त

Monday, 2 March 2015

महापुरुषांचे फेक फोटो

फेक नाटकानंतर आता फेक फोटो पण तयार विकृत लोकांचा नवा प्रताप
गोडसेची खोटी नाटकं बनवली पोट नाही भरलं आता फोटो पण
काही फेक फोटोस Facebook व Whatsapp वर शेयर होत आहेत
एका फोटोत गांधीजी नृत्य करताना दिसतात  हा फोटो सिडनीमधील एका चँरिटी प्रोग्रममध्ये एका अफ्रिकन अभिनेत्याचा आहे ज्याने गांधीजींचा पेहराव केला आहे तर दुसरा व तिसरा फोटो 1963 साली आलेल्या Nine hours to Rama या चिञपटातील  आहे...Horse Buchholz या ऑस्ट्रेलियन अभिनेत्याने गोडसेची भुमिका केली होती....

काही लोकांचे असले फेक फोटो आणि अफवा पसरवुनच पोट भरते असे दिसते
आणि असल्या फोटोला
Reality of  गांधी वगैरे नाव देतात
फेसबुकवर सर्वच लोक वेडे वाटतात का हो तुम्हाला
काय तर म्हणे 55कोटी, फाळणी , काहीही खोटी कारण सांगायची
मग 1934ला कशाला हल्ला केला ?तेव्हा काय गांधी याच्या स्वप्नात आलते काय ?

अरे जेव्हा देश स्वातंत्र्यदिन साजरा करत होता  तेव्हा गांधीजी  एकटे पायी हिंसा थांबवण्यासाठी मुख्यतः मुस्लिम बहुसंख्याक व हिंदु बहुसंख्याक भागात पायी फिरत होते  ...
अहिंसक किंवा सशस्त्र दोन्ही प्रकारे लढा देणारी माणसं गांधीजी ना प्रेरणादायकच मानत होती
कारण आझाद हिंद सेना स्थापन केल्यावर ही नेताजींनी त्यात ज्या 2तुकड्या बनवल्या त्यांची नावे गांधी टुकडी व नेहरू टुकडी होते
व आकाशवाणीवरून गांधीजीना राष्ट्रपिता म्हणणारे नेताजी सुभाषचंद्र बोसच होते
पण ज्यांनी ना अहिंसक ना  सशस्त्र क्रांतीत कुठेही भाग घेतला नाही व नुसतीच हिंसक व ज्वलंत  भाषणे दिली अशा निष्क्रिय माणसांनी तेव्हाही द्वेश व अफवा पसरवण्याचे कार्य केले व आजही तेच करत आहेत?
असल्या खोट्या अफवांपासुन सावध रहा
हा जो अपप्रचार व अफवा पसरवणे त्यांनी चालू आहे हे त्यांच्या वाईट कृत्यामुळे नसुन चांगल्या लोकांच्या शांत बसण्यामुळे शक्य झाले आहे

Wednesday, 18 February 2015

शिवाजी महाराज आणि आपण

सर्व मित्रांना नम्र विनंती कि शिवाजी महाराज प्रत्येकाने व्यवस्थित अभ्यासावे
आता ऊद्या शिवाजी महाराजांचा खरा ईतिहास सोडुन त्यांच्याबद्दल हिंदुत्ववादी लोकांनी लिहलेल्या ईतिहासाचे मेसेज
अनेक लोक अंधपणे पसरवतील
जे Valentine day ला भगतसिंग बलिदान दिवसांचे खोटे मेसेज आणि पोस्ट शेयर करत होते  ते आता शिवाजी महाराजांना ही फक्त एकाच धर्माचा राजा वगैरे वगैरे म्हणतील पण लक्षात ठेवा शिवाजी महाराज हे रयतेचे राजा होते
शिवाजी राजे शेतक-यांचा कैवारी होते, कुळवाडी भुषण होते, रयतेचे रक्षक होते, राजाची वस्त्रे घालून सिंहासनावर बसणारा सामन्य माणूस होते, सरदारांचा सन्मान राखणारा गुणग्राहक राजा होते स्त्रीला सन्मान देणारे नरवीर होते, मुत्सद्दीपणे शत्रूशी दोन हात करणारा पराक्रमी राजा होते अशी शिवरायांची अनेक रुपे सोडुन आपण त्यांना फक्त कोणा एका धर्मात व  जातीत वाटु नये

भारताबाहेरही त्यांचा प्रभाव होता हे तुम्हाला व्हिएतनामवरुन दिसुन येईल
व्हिएतनाम हा छोटासा देश 20 वर्षे अमेरिकेविरुध्द लढत होता
अमेरिकेच्या बलाढ्य nuclear weapons समोर तो तग धरु शकत नव्हता पण तो जिंकला त्या यशाचे रहस्य त्यांनी शिवाजी महाराजांची प्रेरणा हे सांगितले होते.documented आहे
त्यांचा साईटवर जाऊन पहा
बाहेरचा देश त्यांच्याकडून प्रेरणा घेतो आणि आपण त्यांना नुसता एका धर्माविरुध्द वा एका धर्माच्या बाजुने वगैरे म्हणतो

छत्रपति शिवरायांच्या कार्याचा अभ्यास करताना अनेक इतिहासकार वेगवेगळ्या दृष्टीकोनातून शिवाजी महाराज मांडतात
पण 'कै. नरहर कुरुंदकर' यांचे  लेखन एकदम practical वाटते कुठे अतिशयोक्ति नाही कि कुठे अतिरंजितपणा नाही .
'छत्रपति शिवाजी महाराज - जीवन रहस्य'  या त्यांनी लिहिलेल्या फक्त 60पानांच्या पुस्तकात आपणासमोर  बर्याच माहिती नसलेल्या गोष्टी ऊलगडत जाता
श्रीमान योगी'(लेखक रणजित देसाई )ला सुध्दा नरहर कुरुंदकर सरांची प्रस्तावना आहे जमल्यास ती वाचावी
पुस्तकातील खालील 2परखड ऊतारे खुप काही सांगुन जातात

"त्यांच्या कार्याकडे मुसलमानांच्या विरुद्ध हिंदूंचा उठाव म्हणून पाहणे काही जणांना आवडते. प्रत्यक्ष शिवाजी महाराजांच्या चरित्रात अशा धार्मिक संघर्षाला फारसा वाव नाही"

"परस्परांच्या विरोधी उभी राहणारी माणसे कोणत्या ना कोणत्या धर्माची असतातच, त्यांच्यामधील राजकीय ध्येयवादाच्या संघर्षाला दोन धर्मांच्यामधील परस्परविरोधी संघर्ष समजणे हीच एक मूलभूत चूक आहे. मध्ययुगातील अनेक संघर्षांचा अर्थ यामुळे कळू शकणार नाही"

आणि खालील वाक्य तर अप्रतिमच
"शिवाजी म्हणजे युद्ध नव्हे, तर नव्या व्यवस्थेचा आग्रह ... त्या व्यवस्थेच्या रक्षणासाठी युद्ध हे साधन.'

आजही शिवाजी महाराज तेवढेच Relevant आहेत
त्यांची management आणि ईतर असंख्य पैलु आपण अभ्यासले पाहिजेच.
पण सर्वात महत्वाचे म्हणजे ते आयुष्यात implement केले पाहिजेत तेव्हा कुठे आम्हाला शिवाजी महाराज खर्या अर्थाने समाजतील

संकेत मुनोत

जय जिजाऊ !!! जय शिवराय !!!